

पर्यावरण दिवस पर हरित संकल्प, लेकिन दुमुहान नदी दम तोड़ने की कगार पर - खनन परियोजना पर उठे गंभीर सवाल
बड़कागांव : एक ओर विश्व पर्यावरण दिवस के मौके पर एनएमएल पकरी बरवाडीह कोयला खनन परियोजना में हरित विकास, वृक्षारोपण और पर्यावरण संरक्षण के बड़े-बड़े दावे किए गए, वहीं दूसरी ओर क्षेत्र की जीवनरेखा मानी जाने वाली दुमुहान नदी के अस्तित्व पर मंडराते संकट ने इन दावों की सच्चाई पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। परियोजना प्रबंधन द्वारा पर्यावरण दिवस पर पौधारोपण, शपथ ग्रहण और जागरूकता कार्यक्रमों का आयोजन कर पर्यावरण संरक्षण का संदेश दिया गया। अधिकारियों और कर्मचारियों ने प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण और सतत विकास के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई। लेकिन जमीनी हकीकत इन दावों से बिल्कुल अलग तस्वीर पेश कर रही है। स्थानीय मुखिया इलियास अंसारी और पंचायत समिति सदस्य फयूम अंसारी ने आरोप लगाया है कि एनटीपीसी की पकरी बरवाडीह कोल माइंस परियोजना ने दुमुहान नदी के अस्तित्व को गंभीर खतरे में डाल दिया है। उनका कहना है कि नदी के उद्गम स्थल से लेकर सोनबरसा मोड़ तक भारी पैमाने पर ओवरबर्डन (ओबी) डंपिंग की गई है, जिससे नदी का प्राकृतिक प्रवाह लगभग समाप्त हो चुका है। आरोप है कि नदी की जलधारा या तो पूरी तरह अवरुद्ध हो गई है या गंभीर रूप से बाधित हो चुकी है। इलियास अंसारी के अनुसार, दुमुहान नदी आसपास के दर्जनों गांवों के लिए सिंचाई, पशुपालन और दैनिक जीवन का मुख्य जल स्रोत रही है। लेकिन खनन गतिविधियों के विस्तार और ओबी डंपिंग के कारण न केवल नदी का स्वरूप बिगड़ रहा है, बल्कि जलस्तर और भूजल पुनर्भरण की प्रक्रिया भी प्रभावित हो रही है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले वर्षों में क्षेत्र भीषण जल संकट और कृषि संकट का सामना करेगा। खनन क्षेत्र से जुड़े न्यायिक अभिलेख भी इस चिंता को और गंभीर बनाते हैं। दस्तावेजों में उल्लेख है कि दुमुहानी नाला (दुमुहान नदी) खनन क्षेत्र के बीच से गुजरता है और भविष्य में इसे मोड़कर दूसरे नाले से जोड़ने की योजना प्रस्तावित रही है। यह तथ्य नदी के प्राकृतिक अस्तित्व के साथ संभावित छेड़छाड़ की ओर इशारा करता है। वहीं, एनटीपीसी प्रबंधन का दावा है कि परियोजना में सभी वैधानिक पर्यावरणीय मानकों का पालन किया जा रहा है और पर्यावरण संरक्षण, जल प्रबंधन तथा हरित विकास के लिए विभिन्न कदम उठाए जा रहे हैं। कंपनी द्वारा नियमित पर्यावरण निगरानी, वृक्षारोपण और संरक्षण कार्यों का भी हवाला दिया जाता रहा है। लेकिन सामाजिक कार्यकर्ताओं का स्पष्ट कहना है कि विकास के नाम पर प्राकृतिक जल स्रोतों की अनदेखी किसी भी कीमत पर स्वीकार्य नहीं हो सकती। उनका मानना है कि यदि दुमुहान नदी को उसके मूल स्वरूप में संरक्षित नहीं किया गया, तो इसका दीर्घकालिक दुष्प्रभाव पर्यावरण, कृषि और ग्रामीण जीवन पर विनाशकारी रूप से पड़ेगा।
अब पूरे क्षेत्र की निगाहें जिला प्रशासन, राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और संबंधित विभागों की कार्रवाई पर टिकी हुई हैं। ग्रामीणों ने मांग की है कि दुमुहान नदी क्षेत्र का तत्काल वैज्ञानिक सर्वेक्षण कराया जाए, ओबी डंपिंग के प्रभावों की निष्पक्ष जांच हो और यदि नदी प्रभावित पाई जाती है तो उसके पुनर्जीवन और संरक्षण के लिए ठोस और त्वरित कदम उठाए जाएं।
सवाल यह है कि क्या पर्यावरण दिवस पर लिए गए हरित संकल्प केवल औपचारिकता बनकर रह जाएंगे, या वास्तव में दुमुहान जैसी जीवनदायिनी नदियों को बचाने के लिए निर्णायक कदम उठाए जाएंगे।
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