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जंतर-मंतर से उठी आवाज़: 26 दिनों का संघर्ष, लाठीचार्ज, और अंततः इस्तीफाA voice raised from Jantar Mantar: A 26-day struggle, a lathi-charge, and finally, a resignation
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Published July 26, 2026
By Safar24 News channel
जंतर-मंतर से उठी आवाज़: 26 दिनों का संघर्ष, लाठीचार्ज, और अंततः इस्तीफा    A voice raised from Jantar Mantar: A 26-day struggle, a lathi-charge, and finally, a resignation

नई दिल्ली।राजधानी दिल्ली के जंतर-मंतर पर बीते 26 दिनों तक चला आंदोलन देश की शिक्षा व्यवस्था, छात्र अधिकारों और राजनीतिक जवाबदेही को लेकर एक बड़ा जनांदोलन बन गया। कॉकरोच जनता पार्टी और प्रख्यात सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक के नेतृत्व में शुरू हुआ यह धरना-प्रदर्शन धीरे-धीरे राष्ट्रीय स्तर का मुद्दा बन गया। आंदोलन के दौरान भूख हड़ताल, छात्रों की भागीदारी, पुलिस की सख्ती, लाठीचार्ज, और अंततः केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे तक की घटनाएं इस पूरे संघर्ष को ऐतिहासिक बना गईं।

यह केवल एक विरोध प्रदर्शन नहीं था, बल्कि यह उस असंतोष की अभिव्यक्ति थी जो वर्षों से शिक्षा व्यवस्था में सुधार की मांग को लेकर भीतर ही भीतर उबल रहा था।

पहला दिन: एक शांतिपूर्ण शुरुआत

आंदोलन की शुरुआत शांतिपूर्ण तरीके से हुई। जंतर-मंतर पर सैकड़ों छात्र, सामाजिक कार्यकर्ता और विभिन्न संगठनों के लोग इकट्ठा हुए। उनकी मुख्य मांगें थीं:

शिक्षा प्रणाली में पारदर्शिता, परीक्षा प्रणाली में सुधार, बेरोजगारी पर ठोस नीति, शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा

सोनम वांगचुक ने अपने संबोधन में कहा कि “यह लड़ाई सिर्फ छात्रों की नहीं, बल्कि देश के भविष्य की है।”

दिन 2 से 5: आंदोलन ने पकड़ी रफ्तार

शुरुआती दिनों में ही आंदोलन ने गति पकड़ ली। देशभर के विभिन्न विश्वविद्यालयों से छात्र दिल्ली पहुंचने लगे। सोशल मीडिया पर #EducationReform और #ResignDharmendraPradhan जैसे हैशटैग ट्रेंड करने लगे।

कॉकरोच जनता पार्टी ने इसे संगठित रूप दिया और रोजाना प्रेस ब्रीफिंग के माध्यम से सरकार पर दबाव बनाना शुरू किया।

दिन 6 से 10: भूख हड़ताल और जनसमर्थन

छठे दिन से आंदोलन ने नया मोड़ लिया जब सोनम वांगचुक और कई छात्रों ने भूख हड़ताल शुरू कर दी। यह कदम आंदोलन को भावनात्मक और नैतिक ताकत देने वाला साबित हुआ।

देशभर से बुद्धिजीवियों, शिक्षकों और पूर्व छात्रों का समर्थन मिलने लगा। कई विश्वविद्यालयों में समानांतर प्रदर्शन हुए।

दिन 11 से 15: सरकार की चुप्पी और बढ़ता तनाव

सरकार की ओर से कोई ठोस प्रतिक्रिया नहीं आने पर आंदोलनकारियों में नाराजगी बढ़ने लगी। इस दौरान:

छात्रों की संख्या हजारों में पहुंच गई, विपक्षी दलों ने समर्थन देना शुरू किया, मीडिया कवरेज बढ़ गया

हालांकि, सरकार ने इसे “राजनीतिक प्रेरित आंदोलन” बताते हुए गंभीरता से लेने से इनकार किया।

दिन 16 से 20: टकराव की स्थिति

इस चरण में आंदोलन और प्रशासन के बीच टकराव की स्थिति बनने लगी। पुलिस ने जंतर-मंतर क्षेत्र में सुरक्षा बढ़ा दी और प्रदर्शनकारियों को सीमित करने की कोशिश की।

कुछ जगहों पर हल्की झड़पें भी हुईं। प्रदर्शनकारियों ने आरोप लगाया कि उन्हें दबाने की कोशिश की जा रही है।

दिन 21 से 24: निर्णायक मोड़

आंदोलन अपने चरम पर पहुंच चुका था। भूख हड़ताल कर रहे छात्रों की तबीयत बिगड़ने लगी। कई को अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा।

इस दौरान:

अंतरराष्ट्रीय मीडिया ने भी खबर उठाई, मानवाधिकार संगठनों ने चिंता जताई, सरकार पर दबाव बढ़ा

दिन 25: लाठीचार्ज और हिंसा

25वें दिन स्थिति अचानक बिगड़ गई। पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को हटाने के लिए लाठीचार्ज किया। इस घटना में कई छात्र घायल हुए, जिनमें कुछ की हालत गंभीर बताई गई।

यह घटना पूरे देश में आक्रोश का कारण बनी। सोशल मीडिया पर सरकार की आलोचना तेज हो गई।

दिन 26: इस्तीफा और आंदोलन का अंत

लगातार दबाव और आलोचना के बाद अंततः 26वें दिन केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने इस्तीफा दे दिया।

इस घोषणा के बाद आंदोलनकारियों ने इसे अपनी जीत बताया और धरना समाप्त करने की घोषणा की।

आंदोलन का विश्लेषण

1. नेतृत्व की भूमिका

सोनम वांगचुक ने इस आंदोलन को नैतिक आधार दिया। उनका शांतिपूर्ण और अहिंसक दृष्टिकोण लोगों को जोड़ने में सफल रहा।

2. छात्रों की भागीदारी

यह आंदोलन मुख्यतः छात्रों द्वारा संचालित था, जिसने इसे वास्तविक जनांदोलन का रूप दिया।

3. सोशल मीडिया की ताकत

डिजिटल प्लेटफॉर्म ने इस आंदोलन को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहुंचाया।

4. सरकार की प्रतिक्रिया

सरकार की शुरुआती चुप्पी और बाद में कठोर कार्रवाई ने स्थिति को और बिगाड़ा।

5. पुलिस की भूमिका

लाठीचार्ज की घटना ने सरकार की छवि को नुकसान पहुंचाया और आंदोलन को और मजबूती दी।

क्या बदलेगा आगे?

धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि:

क्या शिक्षा व्यवस्था में वास्तविक सुधार होगा?

क्या छात्रों की मांगों को लागू किया जाएगा?

क्या यह आंदोलन भविष्य में और बड़े बदलाव की शुरुआत बनेगा?

जंतर-मंतर का यह 26 दिनों का आंदोलन भारतीय लोकतंत्र में एक महत्वपूर्ण अध्याय के रूप में दर्ज हो गया है। यह केवल एक मंत्री के इस्तीफे की कहानी नहीं है, बल्कि यह उस जनशक्ति की मिसाल है जो शांतिपूर्ण तरीके से भी बड़े बदलाव ला सकती है।

यह आंदोलन हमें यह भी सिखाता है कि जब युवा एकजुट होते हैं, तो वे न केवल अपनी आवाज बुलंद कर सकते हैं, बल्कि सत्ता को झुकने पर भी मजबूर कर सकते हैं।

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